LoveInterCity

वक्त ⏳ की एक पुरानी अलमारी 🗄️ के कोने में, थोड़ी सी धूप ☀️ बचा रखी है मैंने... बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन 👶 में सुखाए हुए गुड़हल के फूल 🌺 किताबों 📚 के पन्नों के बीच दबा कर रख देते थे। 🍂📜✨☕✨📜🍂 शाम 🌇 का एक उदास सा कतरा ठंडी होती चाय ☕ की प्याली में पिघल रहा है, और भाप 🌫️ के साथ हवा 🍃 में तैर रही हैं कुछ अनकही बातें 🗣️, जो किसी रोज़ तुमसे कहनी थीं। और खिड़की 🪟 से छनकर आती रोशनी... मानो कोई भूला हुआ ख़त ✉️ खोल रही हो। 🥀🍃🌧️🕯️🌧️🍃🥀 ये यादें 💭 भी बड़ी अजीब मेहमान हैं, बिना दस्तक ✊ दिए, दरवाजे 🚪 की कुंडी खटखटाए बगैर कमरे 🛋️ के फर्श पर चुपचाप आ बैठती हैं। कभी कुर्सी 🪑 पर टंगे पुराने कोट 🧥 की तरह, तो कभी पर्दे 🪟 की सलवटों में छुपकर। 📻🌾⏳🍂⏳🌾📻 तुमने तो हंसकर 😔 कहा था— "वक्त ⏳ के बहते पानी 🌊 में सब धुल जाता है," पर देखो न, आज भी तुम्हारी उस हल्की सी हंसी 😊 की गूंज दीवार 🧱 पर लटकी पुरानी घड़ी 🕰️ की टिक-टिक से होड़ ⏱️ लगा रही है। 🍁✨💧💭💧✨🍁 बाहर आंगन 🏡 का नीम का पेड़ 🌳 अपनी टहनियों को थोड़ा नीचे झुकाकर 🌿 शायद हमारी ही पुरानी कहानियां 📖 सुन रहा है। हवा 🌬️ का एक सुस्त सा झोंका आता है, सूखे पत्तों 🍂 को फर्श पर घसीटता हुआ... जैसे कोई भूला-भटका ख़त ✉️ खुद को दोबारा पढ़ने की नाकाम कोशिश कर रहा हो। 🌿🕊️🌾📜🌾🕊️🌿 मैंने खिड़की 🪟 के कांच पर जमी भाप पर अंगुली ☝️ से एक अधूरा सा नाम ✍️ लिखा, और बूंदों 💧 ने बहकर उसे धीरे-धीरे मिटा दिया... बिल्कुल वैसे ही, जैसे तुमने आहिस्ता-आहिस्ता 🚶‍♂️ अपनी मौजूदगी के सारे निशान 👣 समेट लिए थे। 🌧️💧🕯️✨🕯️💧🌧️ कभी-कभी सोचता हूँ 🤔, कि जो लफ्ज़ ज़बान से निकल गए, वो तो हवा 🌬️ में धुएं 🌫️ की तरह उड़ गए। लेकिन जो बातें होंठों 💋 पर आकर ठहर गईं, वो आज भी कमरे की इस ख़ामोशी 🤫 में किसी पुरानी माचिस 🛈 की तीली की तरह एक छोटी सी चिंगारी 🎇 दबाए बैठी हैं। 🥀🕯️🍂💭🍂🕯️🥀 रात 🌙 अब धीरे-धीरे गहराने लगी है, दीवार पर बना चिराग 🕯️ का साया 👥 अब थोड़ा और लंबा होने लगा है। मैंने चाय ☕ का आख़िरी घूंट लिया, और वक्त ⏳ की उस अलमारी 🗄️ को आहिस्ता से बंद कर दिया... इस उम्मीद 🌟 के साथ, कि कल सुबह 🌅 फिर थोड़ी सी धूप खिलेगी, और फिर किसी मोड़ 🛣️ पर एक बार फिर मुलाकात 🤝 होगी— तुमसे नहीं, तो तुम्हारी छोड़ी हुई उसी किसी पुरानी बात 💭 से। 🌿🍂📜☕✨☕📜🍂🌿

रक्षाबंधन#Rakshabandhan#shayari#shayari 2026